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वो एक प्यासी सी चिड़िया......

Posted On: 21 Jun, 2013 में

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वो जेठ की दोपहरी,
एक सुन्दर पंखो वाली चिड़िया

न जाने कहाँ से आई
मेरे छज्जे में शोर मचाती
क्या कहा उसने मै ये समझ न पाई|

बाहर जाके जब देखा ,
फुर से फिर वो उड़ गई |

क्या जाने हुआ अचानक ,
अपने पंखो को समेटे ,
वो सामने मेरे गिर गई |

इसको क्या हुआ अचानक
मुझे कुछ भी समझ न आया ,
अपने हाथों में लेकर उसको मैंने सहलाया |

फिर एक बर्तन में पानी
और चावल के कुछ
दाने मै उसके पास रख आई |

पानी पीकर वो चिड़िया
चिं चिं करके उड़ गई |

तब उस दिन मैंने जाना ,
कितने प्यासे ये पंछी ,
एक बूंद न पानी पायें
चाहे दर दर भटक ये आयें |

तब से मै ने ये ठाना ,ये पंछी न प्यासे रह जाएँ
कर्त्तव्य है ये हम सब का ,की इनकी प्यास बुझायें |

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

priti के द्वारा
June 21, 2013

सुन्दर चित्रों के साथ ,मन को छू लेने वाली रचना ,आपको ये जान कर ख़ुशी होगी कि,हम अपने घर में रोज़ चिड़ियों को दाना-पानी देते हैं ,हमारे घर में हर महीने चिड़ियों का भी राशन (काकुन) आता है ,रचना के लिए हार्दिक बधाई !

    Alka के द्वारा
    June 22, 2013

    प्रीती जी , सर्वप्रथम आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है | आपने रचना पसंद की ,व् मेरा उत्साहवर्धन किया इसके लिए धन्यवाद | जानकर बहुत अच्छा लगा की आप भी चिड़ियों को रोज दाना पानी देती हैं | साभार …..


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