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ये आँखें ....

Posted On: 7 Feb, 2016 कविता में

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ये आँखें ,
बहुत कुछ कहती अनकहा
बींध जाती हैं कही आत्मा मन को ..

कहीं कुछ चुभ जाता है अंतस में
सोचता है ये विवश मन
क्या यही ईश्वर नियति है ,

कहीं पर ढेरों है कपडे .
और शय्या ,और भोजन,
और अनेकों स्वर्ग से सुख

कहीं पर तन पर न कपङे
जमीं शय्या और न भोजन
है अगर तो माँ का साया साथ इनके

ये आँखें ,
कहती है शायद
हम उसी ईश्वर की संताने है लेकिन ,
भेद कितना मेरे और औरों के जीवन में है देखो

मेरी आँखे
देखती है स्वप्न एक फिर ,
भरे इन आँखों में कोई नया सपना ,
हाथ एक एक मिल के हम आगे बढ़ाएं ,
करें फिर साकार इन आँखों का सपना

करें फिर साकार इन आँखों का सपना .

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
February 18, 2016

अलका जी ! कम लोग हैं जो यथार्थ को आत्मसात कर पते हैं i सुन्दर कविता ……

    Alka के द्वारा
    February 24, 2016

    आदरणीय सर जी , आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है | प्रोत्साहन के लिए साभार धन्यवाद ..

Shobha के द्वारा
February 13, 2016

अति सुंदर लिखा है आपने अलका जी

    Alka के द्वारा
    February 24, 2016

    आदरणीय शोभा जी , आपका आशीर्वाद मिला धन्यवाद .. साभार ..

    Alka के द्वारा
    February 24, 2016

    आदरणीय शोभा जी , आपका आशीर्वाद मिला धन्यवाद.. साभार ..

sadguruji के द्वारा
February 7, 2016

आदरणीया अल्का जी ! बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता ! हम सब लोग मिल के गरीब और बेसहारा लोंगो के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं ! सादर आभार !

    Alka के द्वारा
    February 8, 2016

    आदरणीय सद्गुरुजी , रचना पसंद करने व् प्रोत्साहन के लिए सादर आभार .. ये प्रोत्साहन हमें नया कुछ करने की प्रेरणा देते है .. साभार ..


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