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सिद्ध मंदिर और अब्यवस्थाएं ...

Posted On: 15 Oct, 2016 Social Issues में

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वर्षा ऋतु जाते जाते कभी कभी पीछे मुड़कर कुछ फुहारें छोड़ जाती है |भाद्रपद महीने से ही त्योहारों का शुभारम्भ हो जाता है |
देश का हर हिस्सा किसी न किसी त्यौहार का स्वागत जोश और उत्साह से करता है .|कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, नवरात्री व् अन्य कई त्यौहार लगातार आते हैं |इन दिनों मंदिरों में विशेष चहल पहल रहती है हर कोई मंदिरों में दर्शनार्थ जाता है |

हर जगह बस भीड़ ही भीड़ दिखाई देती है |इन दिनों मंदिर अब्यवस्था की परिभाषा बन जाते हैं |हमारे देश में जो सिद्ध मंदिर हैं उनमे तो वर्ष भर भीड़ ही भीड़ बनी रहती है |अब ये भीड़ आप कहीं भी जाएँ तो मिलती ही है |

अभी पिछले माह जन्माष्टमी का त्यौहार था |इस्कान मंदिर मेरे घर के पास ही है इस बार किसी जानने वाले ने कुछ वी आई पी पास हमें दिए थे |हम सब अति उत्साहित थे |मेरे ससुर जी लगभग ८३ -८४ वर्ष के हैं |व् सासु माँ ८० के लगभग |हम सब ने उन्हें भी मना लिया साथ चलने को |सोचा वी आई पी मार्ग से ही तो जाना है |
प्रसाद वगैरह बना कर झूला सजा कर घर में सब तैयारी कर के करीब ७.३० पर शाम को हम सब निकले |बच्चों के पेपर होने की वजह से वो हमारे साथ नहीं गए जो शायद बहुत अच्छा हुआ |

मंदिर से करीब आधा किलो मीटर दूर कार पार्किंग की जगह थी |आधे घंटे में किसी तरह कार पार्क करके हम सब चल कर गेट तक पहुच गए |गेट से चल कर १५ मिनटकी दुरी पर चप्पल रखने की व्यवस्था थी पाप का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था |अतः गेट के पास ही गॉर्ड के पास हमने अपने जूते चप्पल रख दिए |हम सब अंदर पहुंचे पर वहां जबरजस्त भीड़ थी |एक महिला अपना पास दिखाते हुए आगे जाने लगी तो उन्हें समझाया गया की इस पास का कोई खास महत्व नहीं है |

हम सब किसी तह आगे बढे मैंने देखा पीछे से कुछ सीढियाँ ऊपर जा रही है जो पीछे की और से हमें मंदिर के गर्भगृह में ले जाएँगी |मुझे बेहद चिंता हुई क्यों की पाप हर्ट पेशेंट हैं पर वापसी का कोई का कोई रास्ता न था |किसी तरह हम सब ऊपर मंदिर में पहुंचे पर सच मानिये मेरे मन में इस बीच रंच मात्र भी भक्तिभाव नहीं जागा| क्यों की सारा ध्यान तो भीड़ की धक्का मुक्की और आगे बढ़ने पर ही था |खैर किसी तरह हम अंदर पहुच ही गए पर ठीक से कान्हा जी के दर्शन भी न हुए और पीछे से आये एक धक्के ने हमें आगे धकेल दिया |
मैं मन ही मन कह रही थी की हे कान्हा हमें इस भीड़ से निकालो |पापा की तबियत कुछ बिगड़ सी रही थी आगे इस्कान के कुछ सेवक इतनी भीड़ में भी लोंगों को चंदा देने के लिए रोक रहे थे |इसी बीच कोई भीड़ में गुस्साया की क्या तभी मानोगे जब कोई गिर या बेहोश हो जायेगा |जैसे तैसे हम बाहर आये हम सब बहुत परेशान हो चुके थे अतः किनारे से निकलने लगे लेकिन वहां कार्यकर्ता जबरजस्ती प्रसाद दे रहे थे |हमने थोड़ा सा प्रसाद ले तो लिया पर उसे खाने की हिम्मत न हुई क्यों की वहां इतनी गंदगी फ़ैल चुकी थी औए प्रसाद खुला रखा था व् गंदे हाथों से बांटा जा रहा था |हम लोग दूसरों को शिक्षा देने में तो बहुत आगे है पर स्वयं उस बात का पालन कभी ही करते हो शायद |वहां कूड़ादान होने के वावजूद लोंगों ने प्लेट्स व् गिलास जमीन पर फेक दिए थे |जिससे वहां बहुत गंदगी फ़ैल चुकी थी |किसी तरह हम अपनी कार तक पहुचे यह पहली और आखिरी बार था जब हम इतनी भीड़ में गए थे वो भी माँ पापा के साथ |अन्यथा अपने पास वाले छोटे मंदिर में कम से कम प्रभु चरणों में ध्यान तो लगता था|

मेरा तो ये मानना है की इन मंदिरों में फूल माला व् प्रसाद के चढाने पर रोक लगा देनी चाहिए ये तो हम अपने घर के मंदिर में भी चढ़ा सकते है |इनके स्थान पर अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा नुसार जो संभव हो मंदिर के दान पत्र में दालने की ब्यवस्था हो जो मंदिर की सफाई व् अन्य ब्यव्स्थायों में लगाया जा सके |और आवश्यक होतो इनका निजीकरण या सरकार इनकी व्यवस्था अपने हाथ में ले तो संभव है लोग खुद को बदले और भक्तिपूर्वक व् शांतिपूर्वक लाइन में लगकर दर्शन व् मंदिरों की भव्यता का आनंद ले सके |

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