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ढेरों बातें ....

Posted On: 12 Apr, 2017 कविता में

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ढेरों बातें ,
मन के बक्से में इकठ्ठा हो गई हैं,
थोड़ा ही खाली है बस कुछ एक दिन में ये भर जायेगा |

ये बातें ,
दरअसल खर्च ही नहीं होती आजकल ,
तुमसे गुफ्तगू जो नहीं की कई दिनों से मैंने ,

पहले तो दिन में कई बार बातें होती थी ,
कुछ छेड़खानी कुछ शिकवे शिकायत होती थी |

पहले तो कुछ रूठना मानना होता था ,
कुछ बचपन की यादें कुछ तुम्हारा अफसाना होता था |

पहले तो कई घंटे कुछ लम्हों में सिमट जाते थे ,
उस खिलखिलाहट पे सच में हम मर जाते थे |

सोचती हूँ इस बातों वाले बक्से को
बहुत सम्हाल के सहेज के रखूंगी मै ,

क्या पता कई सालों बाद मिलो जब तुम ,
तो तुमसे करने को कोई बात ही न हो |

तब इसी बक्से को खोल कर
सारी बातें निकाल लाऊंगी मै ,

फिर ढेरों बातें ,
मन के बक्से से बाहर आ जाएँगी ,

फिर उन्हें सुनकर तुंम खिलखिलाओगे ,
फिर उस खिलखिलाहट पे सच में मै मर जाउंगी |

क्या तुम आओगे सुनने
ढेरो बातें…
अधूरी बातें …

अलका .

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
April 17, 2017

पहले तो कुछ रूठना मनाना होता था , कुछ बचपन की यादें कुछ तुम्हारा अफसाना होता था | वाह, सुन्दर , सरल शब्दों में आपने अपने जज्बातों को कविता के माध्यम से परोसा है / बधाई

    Alka के द्वारा
    April 20, 2017

    राजेश जी, रचना पसंद करने व सराहना के लिए हार्दिक आभार धन्यवाद..

yamunapathak के द्वारा
April 13, 2017

बेहद खूबसूरत ज़ज़्बात हैं अलका जी बहुत बहुत आभार

    Alka के द्वारा
    April 15, 2017

    यमुना जी कविता पसंद करने व सराहना के लिए साभार धन्यवाद ।


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